Sanjeevani Sudha by Swami Ram Sukh Das
Book Type- Hindi Knoledge ebooks
File Format- PDF
Language- Hindi
Total Pages- 486
Size- 61Mb
Quality- HQ, without any watermark,

‘संजिवनी सुधा’ स्वामी रामसुखदास जी महाराज की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कृति है। इस ग्रंथ का नाम ही उसके उद्देश्य को स्पष्ट करता है—‘संजिवनी’ अर्थात जीवन प्रदान करने वाली, और ‘सुधा’ अर्थात अमृत। यह पुस्तक आत्मा को अज्ञान, मोह और सांसारिक बंधनों से मुक्त कर आध्यात्मिक जीवन की ओर जागृत करने वाली अमृतवाणी के समान है।
लेखक परिचय
स्वामी रामसुखदास जी 20वीं शताब्दी के एक महान संत और गीता-प्रचारक थे। उनका जीवन पूर्णतः भक्ति, साधना और लोककल्याण को समर्पित था। वे गीता प्रेस, गोरखपुर से जुड़े रहे और उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता सहित अनेक ग्रंथों की सरल और व्यवहारिक व्याख्या की। उनका उद्देश्य था कि सामान्य व्यक्ति भी गूढ़ आध्यात्मिक सिद्धांतों को समझ सके और उन्हें अपने जीवन में उतार सके।
पुस्तक की मुख्य विषयवस्तु
- ईश्वर-प्राप्ति का सरल मार्ग
पुस्तक में बताया गया है कि ईश्वर की प्राप्ति कोई कठिन या दुर्लभ साधना नहीं है। ईश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में विराजमान हैं। आवश्यकता केवल शुद्ध भाव, श्रद्धा और समर्पण की है। जब मनुष्य अहंकार और आसक्ति को छोड़ देता है, तब वह सहज रूप से ईश्वर का अनुभव कर सकता है। - समर्पण और अहंकार का त्याग
स्वामी जी के अनुसार, दुःख का मूल कारण ‘मैं’ और ‘मेरा’ की भावना है। जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, तब तक वह बंधन में रहता है। संपूर्ण समर्पण से ही सच्ची शांति प्राप्त होती है। ईश्वर को सब कुछ अर्पित कर देने से मन हल्का और शांत हो जाता है। - निष्काम कर्म
पुस्तक में गीता के निष्काम कर्म सिद्धांत को सरल रूप में समझाया गया है। कर्म करना आवश्यक है, परंतु उसके फल की इच्छा करना बंधन का कारण है। जब कर्म ईश्वरार्पण भाव से किया जाता है, तब वह साधना बन जाता है। - संसार से वैराग्य
संसार के सभी संबंध और वस्तुएँ नश्वर हैं। उनसे अत्यधिक आसक्ति दुःख को जन्म देती है। स्वामी जी यह नहीं कहते कि संसार त्याग दो, बल्कि यह सिखाते हैं कि भीतर से आसक्ति का त्याग करो और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए भी ईश्वर-स्मरण बनाए रखो। - नामस्मरण और भक्ति
ईश्वर के नाम का जप, प्रार्थना और सत्संग को अत्यंत महत्व दिया गया है। निरंतर नामस्मरण से मन शुद्ध होता है और आत्मा में शांति का संचार होता है। भक्ति के माध्यम से ही मनुष्य ईश्वर के निकट पहुँच सकता है।
शैली और विशेषता
‘संजिवनी सुधा’ की भाषा अत्यंत सरल, मधुर और प्रभावशाली है। इसमें दार्शनिक गहराई तो है, परंतु प्रस्तुति सहज और व्यवहारिक है। स्वामी रामसुखदास जी कठिन शास्त्रीय तर्कों में उलझने के बजाय सीधी और स्पष्ट शिक्षा देते हैं। उनके शब्दों में करुणा, स्नेह और आध्यात्मिक अनुभव की गहराई दिखाई देती है।
आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता
आज का जीवन तनाव, प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा से भरा हुआ है। ऐसे समय में यह पुस्तक मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करती है। यह सिखाती है कि सच्चा सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़ने में है। समर्पण, संतोष और श्रद्धा के द्वारा मनुष्य जीवन की कठिनाइयों को सहजता से पार कर सकता है।
निष्कर्ष
‘संजिवनी सुधा’ केवल एक धार्मिक पुस्तक नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शक ग्रंथ है। यह मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप की पहचान कराता है और ईश्वर से उसके संबंध को स्पष्ट करता है। स्वामी रामसुखदास जी की यह कृति आज भी साधकों के लिए प्रेरणा और शांति का स्रोत बनी हुई है।
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